शनिवार, 4 नवंबर 2023

10 नवंबर को 'आयुर्वेद दिवस'

5 नवंबर 2023 को देशभर के 11 शहरों नई दिल्ली, लखनऊ, नागपुर, चेन्नई, जयपुर, पटियाला, ग्वालियर, हैदराबाद, विजयवाड़ा, तिरुवनंतपुरम, अहमदाबादमें बाइकर्स रैलियां आयोजित की जाएंगी।  


केंद्रीय आयुर्वेद अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली की निदेशक डॉ.भारती दिल्ली में डेढ़ सौ से अधिक युवा बाइकर्स की रैली को हरी झंडी दिखाएंगी।

आयुर्वेद दिवस का मुख्य आयोजन 9-10 नवंबर 2023 को हरियाणा के पंचकुला में होगा

प्रविष्टि तिथि: 04 NOV 2023 6:43PM by PIB Delhi

‘आयुर्वेद फॉर वन हेल्थ' संदेश के साथ देश भर के 11 शहरों में राष्ट्रव्यापी बाइकर्स रैलियां आयोजित की जा रही हैं। ये रैलियां 5 नवंबर, 2023 को सुबह 6 बजे से 10 बजे तक विभिन्न शहरों में निर्धारित की गई हैं। इन रैलियों का मुख्य उद्देश्य देश भर के युवाओं को आयुर्वेद दिवस के वैश्विक संदेश ‘आयुर्वेद फॉर वन हेल्थ' से जोड़ना और आयुर्वेद की समृद्ध विरासत और सार्वजनिक कल्याण के लिए आयुर्वेद के समग्र दृष्टिकोण को बढ़ावा देना है।

केंद्रीय आयुर्वेद अनुसंधान संस्थान (CARI) दिल्ली और पटियाला, राष्ट्रीय आयुर्वेद अनुसंधान संस्थान (RARI) लखनऊ, नागपुर, जयपुर, विजयवाड़ा, तिरुवनंतपुरम और अहमदाबाद में, डॉ. ए. लक्ष्मीपति राष्ट्रीय आयुर्वेद अनुसंधान संस्थान और कैप्टन श्रीनिवास मूर्ति केंद्रीय आयुर्वेद अनुसंधान संस्थान, चेन्नई और एनआईएमएच (नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल हेरिटेज) हैदराबाद के सहयोग से युवा बाइकर्स इन रैलियों का आयोजन कर रहे हैं। ये बाइकर्स समूह हैं - अनस और शिवम के नेतृत्व में ट्विन नोमैड्स बाइकर क्लब - दिल्ली, ड्रैगन जेड क्लब के किरण पोलीपल्ली, विशाखापत्तनम से, और ओसवाल्ड स्मिथ डी, तमिलनाडु बाइकर्स एसोसिएशन के सदस्य टीएनबीएएम – चेन्नई से।

केंद्रीय आयुष और बंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मंत्री श्री सर्बानंद सोनोवाल ने कहा कि युवाओं को ‘आयुर्वेद फॉर वन हेल्थ' अभियान से जोड़कर एक मजबूत और स्वस्थ भारत का भविष्य बनाया जा सकता है। आयुर्वेद दिवस के आयोजन का उद्देश्य भारत की हजारों साल पुरानी आयुर्वेदिक चिकित्सा संस्कृति को वैश्विक मंच पर ले जाना और आयुर्वेद को दुनिया भर में आम लोगों की जीवनशैली का हिस्सा बनाना है। विभिन्न शहरों में ये बाइकर्स रैलियां निश्चित रूप से युवाओं को आयुर्वेद और देश की अन्य पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को अपनाने के लिए प्रेरित करेंगी।

दिल्ली बाइकर्स ग्रुप के समन्वयक अनस और शिवम, ट्विन नोमाड्स बाइकर्स क्लब टीएनबीसी, मोहम्मद अरशद, पुरानी दिल्ली मोटरसाइकिलिस्ट - पीडीएम, आशीष (वीकेंड राइडर्स क्लब - डब्ल्यूआरसी, मोहम्मद समीर (कायी राइडर ग्रुप - केआरजी), केसी त्यागी, मेराकी राइडर ग्रुप - एमआरजी हैं। रैली केंद्रीय आयुर्वेद अनुसंधान संस्थान (सीएआरआई), पंजाबी बाग से सुबह 8 बजे शुरू होकर मोतीबाग से जकीरा होते हुए वापस सीएआरआई पहुंचेगी। देश में आयुर्वेद और अन्य पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाने के लिए 20 दिव्यांग बाइकर्स का एक समूह भी रैली में शामिल होगा।

आयुष मंत्रालय द्वारा 9-10 नवंबर 2023 को हरियाणा के पंचकुला में आयुर्वेद दिवस के मुख्य कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। आयोजन से पहले आयुष मंत्रालय की ओर से देशभर के युवाओं को यह संदेश देने के लिए ये रैलियां आयोजित की जा रही हैं कि बच्चों, किशोरों, युवाओं और आम जनता के स्वास्थ्य के लिए आयुर्वेद जरूरी है। आठवें आयुर्वेद दिवस के उपलक्ष्य में महीने भर चलने वाले इस समारोह में तीन प्रमुख घटक हैं- छात्रों के लिए आयुर्वेद, किसानों के लिए आयुर्वेद और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए आयुर्वेद।

मंगलवार, 1 अगस्त 2023

घर



घर तो वही होता था ना,

रसोई से आती हुई दाल की खुशबू,

आंगन में फैली हुई खटाई,

बरामदे में फैली हुई चटाई,

पिता का घर में आना, 

दूध, सब्जी और साथ में मिठाई लाना,

आते ही होती थी सबकी हाजरी,

गायबों की होती थी धुलाई, 

फिर आता था,

फटकारों का मौसम,

क्यों नहीं खाने में बनाया सहजन,

कल तक हो जाएगा खराब,

क्या जानों पैसे का कद्र,

आठ घंटे की ड्यूटी, 

दो घंटे आना-जाना,

घर आते ही रोज के नये लफड़े सुलझाना,

किसी खरोच, तो किसी को बुखार,

अभी-अभी गयी है ठंढ़

बड़े प्यार सेओढ़ा देते थे चादर,

न लग जाये किसी को सर्दी,

बंद रहता था, 

मां के कान के साथ ही जुवान,

मौका मिलते ही,

सुलझाने बैठ जाती थी,

ऊन की उलझने,

खोल देती थी हर गांठ 

और सुलझा देती थी, 

हर उलझन.

मंगलवार, 25 जुलाई 2023

अधेड़ औरतें क्यों भागती हैं घर से

कई बार ऐसा होता है,

घर छोड़कर भाग जाती हैं.

अधेड़ औरतें,

कभी अकेली ही,

तो कभी सहारे के लिए किसी के साथ,

इसलिए नहीं कि

उन्हें  डराती हैं जिम्मेदारियां,

उन्हें डराते हैं लोग,

और ले जाते हैं इस हद तक, 

कि तिनका-तिनका जोड़ा घर ही,

उन्हें बेगाना लगने लगता है,

बेगानी वस्ती से ज्यादा,

वो घर जिसे बार-बार,

उसे अपना बताया जाता है.

 

जन्म लेने से मरने तक, 

जो कभी उसका होता ही नहीं,

सास बनने तक सास का शासन,

बहू के आने से पहले ही,

घर झिन जाने का डर,

उसे हर पल सताता है,

जिस घर को उसे बार-बार,

उसका अपना बताया जाता है.


इतना तो वह सह जाती है,

पर जब गांठ बांधकर,

हाथ थाम कर लाने वाला ही,

कब पराया हो जाता है,

गांठ खोलकर आलमारी में रख देता है,

और हाथ पकड़कर,

किसी और का हो लेता है,

तब अधेड़ औरत,

बेगानों को छोड़कर,

बेगानी वस्ती को ओर निकल जाती है.

शनिवार, 22 जुलाई 2023

चांद मामू क्या कीमत है उनकी?

चांद मामू,

उन्हें कोई नहीं पूछता,

न तीज में, न त्योहार में,

न शादी में, न सगाई में,

न उठावनी में, न संसकार में,

वो कभी चर्चाओं में भी नहीं होते,

न अपनों में, न परायों में,

उन्हें अपनी उम्र की गिनती नहीं आती,

और न ही उन्हें पता है रिश्तों का व्याकरण,

वो आज भी वहीं ठहर गए हैं,

अपनी मां की गोद से उतरकर,

अपनी मातृभाषा सीखने से पहले,

उनके लिए कोई उपहार नहीं लाता,

और न ही उनके लिए टॉफी ले जाता है,

उन्हें किसी का इंतजार भी नहीं है, 

उनमें न तो रोशनी है,

न शीतलता है,

न वो गाय हैं, न बकरी

न वो किसी आहार बन सकते हैं,

न ही उनकी खाल से किसी के जुते,

क्या कीमत है उनकी?

कनहोज में पड़े बेजुवान जानवर से भी कम!










चांद मामू,

उन्हें कोई नहीं पूछता,

न तीज में, न त्योहार में,

न शादी में, न सगाई में,

न उठावनी में, न संसकार में,

वो कभी चर्चाओं में भी नहीं होते,

न अपनों में, न परायों में,

उन्हें अपनी उम्र की गिनती नहीं आती,

और न ही उन्हें पता है रिश्तों का व्याकरण,

वो आज भी वहीं ठहर गए हैं,

अपनी मां की गोद से उतरकर,

अपनी मातृभाषा सीखने से पहले,

उनके लिए कोई उपहार नहीं लाता,

और न ही उनके लिए टॉफी ले जाता है,

उन्हें किसी का इंतजार भी नहीं है, 

उनमें न तो रोशनी है,

न शीतलता है,

न वो गाय हैं, न बकरी

न वो किसी आहार बन सकते हैं,

न ही उनकी खाल से किसी के जुते,

क्या कीमत है उनकी?

कनहोज में पड़े बेजुवान जानवर से भी कम!










शुक्रवार, 7 जुलाई 2023

संबंध

 अपनी ही रचनाओं का अर्थ वर्षों बाद समझ में आता है. ये कविता मैंने 1993 में लिखी थी...



संबंध


संबध कोई वृक्ष का पत्ता तो नहीं, 

जो बसंत में लगे,

और पतझड़ में बिखर जाय।

संबंध तो पंचवटी वृक्ष है,

जो एक साथ ही,

पल्लवित, पुष्पित और फलित होता है,

या परिन्दे द्वारा लाये गये बीज से,

या सानिध्य के अहसास से जुड़ गया हो,

पत्ते का वृक्ष से लगना,

और झड़ जाना,

उसकी गति है,

उसकी नियति है,

मगर संबंध कोई वृक्ष का पत्ता तो नहीं है,

जो बसंत में लगे, 

और पतझड़ में बिखर जाय।

माना निर्जीव-सा जुडे रहने के दुख से, 

कट जाने का दुख कम है,

मगर संबंध कोई,

वृक्ष का पत्ता तो नहीं,

जो बसंत में लगे, 

और पतझड़ में बिखर जाय।





शुक्रवार, 14 अप्रैल 2023

ओह!



जब हम सुबह अखबार देखते हैं ....तो कुछ खबरों को पढ़ कर बड़ा अफसोस होता है...दुख होता है...कहते हैं  ओह! 

आज एक खबर...हर अखबार की सुर्खियां बनी है...अतिक अहमद का बेटा असद अहमद का जो हश्र हुआ...उससे हर मां-बाप को सबक लेना चाहिए...असद एक कुम्हार की कच्ची मिट्टी की तरह था...वकिल बनाना चाहता था...पढ़ने में तेज था...प्रयागराज के एक प्रतिष्ठित स्कूल से इंटरमीडिएट की पढ़ाई भी की...आगे की पढ़ाई के लिए लखनऊ चला गया...वह विदेश जाकर लॉ की पढ़ाई करना चाहता था...लंदन के कई कॉलेजों में अप्लाई भी किया...पर अपराधिक परिवार की वजह से उसका पासपोर्ट ही नहीं बन सका...उसे 11 साल की उम्र से ही बंदूक चलाने की ट्रेनिंग दी जा रही थी...उसका परिवेश...उसके अपने मां-बाप के कर्मों ने ही उसकी जिन्दगी छिन ली...काश वह एक संस्कारी मां-बाप का औलाद होता...ऐसी खबरों  पर दुख व्यक्त करने की बजाए... हमें सबक लेने चाहिए...

अनिता कर्ण




सोमवार, 4 दिसंबर 2017

अपना शहर झांक आओ

अपना शहर झांक आओ

कभी तुम अपना शहर झांक आओ,
जहां मेरी मोहब्बत की
हजारों चिठ्ठियां अब भी पड़ी हैं,

मेरा छोटा सा घर,
मेरे टूटे खिलौने,
मेरा सपनों का घरोंदा तो अब भी वहीं हैं,

दरख्तों पर हमने अपनी मोहब्बत की,
जो की थी किताबत
तारीख उसपर अब भी पड़ी,

बह गईं दरिया से हजारों लहरें
आंसुओं में लिपटीं मेरी आंखें
अब भी वहीं हैं.

कभी तुम अपना शहर झांक आओ,
जहां मेरी मोहब्बत की
हजारों चिठ्ठियां अब भी पड़ी हैं.-अनिता कर्ण 30.12.2017

सोमवार, 24 जुलाई 2017

कंडोम मुफ्त, सेनिटरी पैड्स क्यों नहीं?

देश की आधी आबादी को मोदी सरकार से बहुत उम्मीदे हैं, पूरी भी हो रही हैं, लेकिन एक ऐसी उम्मीद, जिसपर न तो महिलाओं ने खुलकर मुंह खोलने की जरुरत समझी और न ही खुलकर मांग की.

सच तो यह है कि 'सेन्टरी नैपकिन' हमारे देश में शोध या खोज का विषय कभी नहीं रहा. पुरुषों से हमेशा 'चुन्दरी का यह दाग' छुपाया गया. फिर नीति निर्धारक पुरुषों की 'नजर' या उनके ख्याल में यह दाग कैसे आता? वहीं महिलाएं अपने हर मौलिक अधिकारों से समझौता करती रही हैं और आज भी कर रही हैं. तब उनकी यह अहम समस्या एक बड़ा मुद्दा कभी नहीं बन सकती, जिसपर चर्चा हो या जनआदोलन किया जाए.

साड़ी-दुपट्टा से नहीं थमता रक्त प्रवाह...

हां, जब जीएसटी लागू हुआ तो मुठ्ठीभर महिलाओं को यह मंहगा लगने लगा. उनकी मांग भी सही है. मौजूदा सरकार या पिछली किसी भी सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय ने महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए इसे इतना अहम नहीं समझा. लेकिन सच तो यह है कि देश के विकास के लिए आधी आबादी का स्वस्थ और शिक्षित होना पहली जरूरत है. महिलाएं स्वस्थ नहीं होंगी तो उनके बच्चे स्वस्थ कैसे होगे? और जब बच्चे स्वस्थ नहीं होंगे तो देश का विकास नारे और विचारों में ही रह जाएगा.

यह बहुत ही छोटा मुद्दा है पर देश की आधी आबादी के लिए बहुत ही अहम. परिवार से लेकर सरकार तक को समझनी चाहिए. शहरी महिलाएं अपने पीरिटड्स के दौरान सेन्टरी पैड का इस्तेमाल करती हैं पर गांवों की ज्यदातर महिलाएं सेन्टरी नैपकिन का नाम तक नहीं जानतीं.  उपयोग करना तो दूर की बात है. अपने देश में 80 फीसदी महिलाएं ही सेन्टरी नैपकिन का इस्तेमाल नहीं करती हैं.

और एक रिसर्च के मुताबिक तो 88 प्रतिशत महिलाएं तो खरीद ही नहीं पाती. वे आज भी पुराने कपड़े, टाट, बालू, राख सूखी पत्तियां और अखबार का इस्तेमाल करती हैं. उपयोग किये गए कपड़ों को बार-बार धोना-सूखाना इनकी लाचारी है.

इससे कई तरह की बीमारियां पैदा होती हैं. डॉक्‍टर्स के माने तो करीब 70 प्रतिशत महिलाएं बांझपन, यूटरेस-वेजाइनल इन्‍फेक्‍शन से पीडि़त हैं. इतना ही नहीं पिछड़े इलाकों की कुछ महिलाएं मासिक धर्म के दौरान किसी भी तरह के पैड का इस्तेमाल ही नहीं करतीं.

अब नहीं लगनी चाहिए 'चुन्दरी में दाग'

हालांकि किशारावस्था में किसी भी लड़की के लिए  'नदी की बाढ़' की तरह इसके रक्त प्रवाह को संभालना आसान नहीं होता है. उनके पांच दिनों के इस रक्त प्रवाह को मां की पुरानी साड़ी और बहन का दुपट्टा मुश्किल से ही रोक पाता है.

इस दौरान महिलाएं कूदना-फांद करना तो दूर ठीक से चल भी नहीं पातीं हैं. दोनों नितंब छिल जाते हैं. माहावारी के दौरान ग्रामीण लड़कियों की 'चाल' लाख छुपाने के बाद भी सबको बयां कर देती है. जरा सी असावधानी उन्हें शर्मसार कर देता है. खासकर किशोरियों के लिए यह किसी आपदा से कम नहीं लेकिन इसके प्रबंधन के लिए कोई योजना नहीं और बनी भी  तो सही तरीके से लागू करने की जरूरी नहीं समझी गयी.

दुख की बात तो यह है कि ग्रामीण इलाकों की किशोरियां पीरियड्स के दौरान पांच-छह दिनों तक स्कूल नहीं जाती हैं. 23 प्रतिशत बच्चियां, पीरियड्स  शुरू होने के बाद स्कूल से ड्रोपआउट हो जाती हैं.

सवाल यह है कि हमारे देश में तकरीबन तीन-चार दशक से गर्भनिरोधक कंडोम मुफ्त बांटे जा रहे हैं लेकिन  सेनिटरी पैड्स क्यों नहीं?  हालांकि कई राज्यों में सेनिटरी पैड्स छात्रों को मुफ्त दिए जा रहे हैं पर ये ऊंट के मुंह में जीरा की तरह है. जबकि सरकारी अस्पतालों और स्कूलों में 12 से 45-50 साल की महिलाओं को 5-10 पैड्स मुफ्त दिये जाएं. तभी महिलाएं 'अपनी चुन्दरी में दाग' से बेफिक्र होगी. जब तक उन्हें दाग का डर डराता रहेगा. वे बेखौफ नहीं होंगी. और तब तक खौफ रहेगा उनका विकास नहीं होगा. और जब तक महिलाओं का विकास नहीं होगा...तब तक देश के विकास पर प्रश्न लगता रहेगा. 

शनिवार, 29 अप्रैल 2017

मुरली मनोहर बोलते रहे, मैं विनोद खन्ना में खोयी रही...


विनोद खन्ना जी के निधन से हमें बहुत दुख हुआ. ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे.

 विनोद खन्ना जी को मैं बहुत करीब से नहीं जानती, लेकिन वो जब भी याद आते हैं मैं मुस्कुरा देती  हूं.

बात अटल जी की सरकार के समय की है. तब मैं 'राष्ट्रिय सहारा'के रिपोर्टिग में थी. तत्कालीन मानव संसाधन मंत्री मुरली मनोहर जी ने इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में किसी मुद्दे पर प्रेस वार्ता बुलाई थी. मुझे कवर करने के लिए भेजा गया.

किन्हीं कारणों से मैं देर हो गयी. मैं गिरती-पड़ती वहां पहुंची.

अंदर जाने के लिए शीशे का गेट खोला ही था कि पीछे से विनोद खन्ना जी अपने दो-तीन साथियों के साथ नजर आये.

मैंने उनकी राह छोड़ दी. कहा पहले आप, उन्होंने भी कहा पहले आप, दो तीन बार हम एक दूसरे को आप आप कहते रहे, जब उन्होंने बड़े प्यार से अंदर जाने का इशारा किया तो मैं मना नहीं कर पायी.

आगे हम लोग गलती से दूसरे हॉल में चले गये, जहां कोई सेमिनार चल रहा था. हॉल में अंधेरा था, वापस मुड़ने लगे तो गलती से मेरी सैंडिल उनके चप्पल से टकरा गयी, इस बार एक दूसरे को माफ कीजिए, माफ कीजिए कहना पड़ा.

बात यहीं खत्म नहीं हुई. संयोग से जहां वो बैठे, ठीक उनके सामने मुझे बैठने की जगह मिल गयी.
बार-बार उन्हें देखने की मेरी इच्छा हो रही थी.

मुरली मनोहर जी बोलते रहे लेकिन मुझे कुछ सुनाई -दिखाई नहीं दे रहा था, मेरी आंखों के सामने तो बस विनोद खन्ना जी की फिल्मे चल रही थीं. वो अलग-अलग रोल में दिख रहे थे.

कई बार-बार मैंने उन्हें जी भर के देखने की कोशिश की लेकिन हर बार मेरी नजर उनसे टकरा जाती.
इससे पहले मैंने कभी इतना सुशदर्शन पुरुष नहीं देखा था.

शांत शिष्ट और खूबसूरत आंखें, दिव्य चेहरा और शालीन मुस्कुराहट, जिसे बार-बार देखने का मन करता हो.

उस दिन मैंने किसी तरह प्रेस रिलिज से खबर बनायी.

कई दिनों तक विनोद जी मेरे जहन में रहे. जब भी विनोद खन्ना याद आते हैं तो मैं मुस्कुरा देती हूं.

शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

कलम का अल्पविराम

 कलम का अल्पविराम खत्म



साहित्कार अज्ञय ने लिखा है,' दुख सबको मांजता है और दृष्टा बनाता है'. दुख ने मुझे भी मांजा. दृष्टा बनाया या नहीं, कह नहीं सकती. पर भावों से लबरेज जरूर किया और मन का घड़ा भरता गया.

घड़ा भरा हो तो कुछ और नहीं भरा जा सकता . उसे भरने के लिए खाली करना जरूरी होता है और मन को भी.

न जाने क्यों कुछ दिनों से मैं खुद को बीस साल पीछे महसूस कर रही हूं. जब मेरे पास, घर नहीं था, फोन नहीं था, मोबाइल नहीं था, पैसे नहीं थे, नौकरी नहीं थी. एक छोटी सी बाइक हीरो पुक थी, जिसे मैं पूरे शहर में घूमाती थी. वो थकती नहीं, मैं भी नहीं थकती थी.

पटना से दिल्ली आई तो वो भी छूट गयी. मैं अकेली खाली हाथ बेगाना शहर में थी.

लोग मिले, दोस्त मिले, अपने मिले, अपने जैसे मिले, नौकरी, पैसा, घर, गाड़ी, सुख और दुख भी...

'सहारा' ने हमें सहारा दिया पर अपनों के लिए मैंने सहारा छोड़ दिया.

बड़ी पीड़ा और बोझिल मन से मैंने सहारा से विदाई ली. लगा आखिर मेरी कलम की नींव टूट ही गयी, जो मेरी जान से भी अजीज है. मेरी साधना है.

दुख-पीड़ा में मैंने कलम को विराम दे दिया, लेकिन पटना सिटी के प्रतिष्ठित पत्रकार नारायण भक्त याद आते रहे, 'अनिता अच्छा लिखती हो कभी अपनी कलम को विराम मत देना.

मेरी कलम एक बार फिर चल पड़ी है. बेखौफ.... वे मेरे गुरु नहीं थे, गुरु के सानिध्य थे...मैं उनका सम्मान करती हूं. उनके 'कहे' ने हमें प्रेरणा दी है...वह अब जीवित हैं या नहीं पर ये मेरा सादर अभिवादन है.

मंगलवार, 26 मई 2015

'जेही मोहे मारा तेही मैंने मारा'

एक-दो दिनों से हमें अपना बचपन याद आ रहा है. हम गांव में रहते थे. पूरे दिन इधर-उधर खेत-खलियान में घूमते थे. कई बार कांटे भी चुभ जाते थे. तब हम नागफनी ढूंढ़ते थे.

नागफनी का लंबा, नुकीला मजबूत कांटा चुटकी में कांटे को निकाल देता था. तब यह मुहावरा पता भी नहीं था कि 'कांटे से कांटा' निकाला जाता है. लेकिन जान जरूर लिया था कि कांटा निकालने के लिए कांटे का ही इस्तेमाल करना चाहिए. सेफ्टीपिन का नहीं उससे नासूर बन जाता है.

हां, सेफ्टीपिन से कांटा निकालने से नासूर बनते देखा भी है, लेकिन हैरान हूं अब तलक हमारे देश के नेताओं ने क्यों नहीं समझा, क्यों नहीं उनके जेहन ये बात आयी कि 'कांटे से कांटा' से निकाला जाता है.

हमारे रक्षा मंत्री ने पहली बार ये बात कही तो लोग चौंके क्यूं? क्यों हैरान हूए? हमने अब तक कांटों को सेफ्टीपिन से निकालने की कोशिश की, जिसका नतीजा यह हुआ कि यह नासूर बना ही नहीं बढ़ता गया.
रक्षा मंत्री मनोहर पार्रिकर के आतंकियों के संदर्भ में कहा गया मुहावरा 'कांटे से कांटा निकालना' पड़ोसी देश  को चुभ गया है.  पाक बौखला गया है, अपने देश की सियासत में भी खलबली मच गयी, विपक्षी पार्टी सरकार को कोसने लगी, नैतिकता का हवाला देने लगी. रक्षा मंत्री के बयान से नाराज मुख्य विपक्षी दल ने इसके सुबूत देने या फिर सार्वजनिक रूप से माफी मांगने की बात तक कह डाली. यही राजनीति भी है.
हम भी इस बात से सहमत हैं कि उन्हें ऐसी बातें नहीं कहनी चाहिए थी. ऐसी बातें कही भी नहीं जाती. कौटिल्य ने भी कहा है करने वाली बातें नहीं कहनी चाहिए. कूटनीति यही कहती है.

आतंकवाद हमारे देश का बड़ा नासूर है. देश में कितनी आतंकी घटनाएं हुईं? कितनी जानें गयीं? अंगुलियों पर नहीं गिने जा सकते. कितने घर बर्बाद हुए, कितने बच्चे अनाथ हुए, कितनी महिलाएं विधवा हो गईं, किसी से छुपा नहीं है.

दुखद बात तो यह है कि इन आतंकियों से लड़ते-लड़ते हमारे हजारों जवान शहीद हो गए. हम हैरान हैं कि आतंकवाद से निपटने के मुद्दे पर हमारे राजनेता सिद्धांत और नैतिकता की बात कैसे कर रहे हैं. उनसे निपटने के लिए अब तक वाजिब रास्ता नहीं ढूंढा.

क्या इन्होंने बम धमाके की घटनाएं नहीं दिखी, बम विस्फोट की आवाज इनके कान तक नहीं पहुंची. ऐसे नेताओं को अगर इनके सामने आंकड़े और सबूत पेश कर दिया जाएं तो वह अंधों के सामने आईना दिखाने जैसा ही होगा.

अब बात पाकिस्तान की है. रक्षामंत्री की बात पर उसका बौखलाना लाजमी है. किसी से छुपा नहीं है. आतंक की पौध कहां लगी है? कौन सींच रहा है? और इसके पीछे किसका हाथ है. अगर पड़ोसी देश के पास नैतिकता और मानवता जैसी चीज नहीं है तो हम क्यों सिद्धान्त बघार रहे हैं.

दुख तो इस बात का है कि नैतिकता और सिद्धान्त की बात करने वाले अपने ही नैतिक ग्रंथों को ठीक से समझ नहीं पाएं, जहां लिखा है, जो नहिं दंड करों सठ तोरा है भ्रष्ट होइ श्रुति मारग मोरा.

ये बात भी सही है कि रक्षा मंत्री पार्रिकर ने ऐसी बात कहकर भारत के लिए कूटनीतिक मुसीबत खड़ी की, उन्हें रक्षा मंत्री के तौर पर औपचारिक रूप से ऐसी बातें नहीं करनी चाहिए थी. हालांकि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल ने स्थिति को संभालने की कोशिश की और पार्रिकर ने भी बयान से पलटने का प्रयास किया. लेकिन कहते हैं 'तीर कमान से और बात जबान से' निकलने के बाद वापस नहीं आती.

हम तीन दशक से आतंकवाद का दंश झेल रहे हैं. इस दौरान कई सरकारें आईं और गईं. सरकार आतंकवादियों से जूझती रही, चिन्ता व्यक्त करती रही पर सही विकल्प नहीं ढूंढ पायी. अगर पिछली सरकारों ने इसका सही इलाज किया होता तो आज 'कांटे से कांटा' का मुहावरा नहीं पढ़ा जाता.

आतंकवाद अब देश का सबसे बड़ा नासूर बन चुका है. चाहे कांटे से हो या लेजर से...अब इसका सही इलाज जरूरी है. पर एक बात यह भी सच है कि कांटा निकालना है तो नागफनी तलाशनी होगी. गोस्वामी तुलसी दास ने भी कहा है 'जेही मोहे मारा तेही मैंने मारा'.




शनिवार, 16 मई 2015

हर घर में भट्टाचार्या साहब और पीकू

पीकू को अपने पिता की मौत पर दुख होता है. उसकी आंखों से आंसू छलक पड़ते हैं. वह दुखी होती है पर हैरान नहीं होती. उसे खुशी इस बात की है कि उसके पिता को एक शानदार स्वाभाविक मौत मिली.
उसके पिता की इच्छा के मुताबिक उनकी मौत किसी अस्पताल के बिस्तर पर नहीं हुई. न डॉक्टर, न वेंटिलेटर, न इंजेक्शन, न नर्स और न दवाइयां.
सब कुछ उनके मुताबिक ही हुआ. जैसा वो चाहते थे. कांस्टिपेशन से परेशान उसके पिता पूरी तरह से रिलैक्स होकर 'मुकद्दर के सिकंदर' की मौत मरे.
हालांकि पीकू के पिता भट्टाचार्या साहब बड़े ही झक्की, मिजाजी और इरिटेटिंग आदमी थे. पीकू उनपर खीजती है, चिढ़ती है पर वे उसके पिता हैं, हर वक्त उसकी जेहन में रहते हैं. वह उनकी गलत-सही हर बात मानती है. वह उन्हें प्यार करती है.
हालांकि भट्टाचार्या साहब अपने जमाने में बड़े ही सुलझे और शानदार व्यक्तित्व के मालिक रहे होंगे. लेकिन बुढ़ापा ऐसा हा होता है. भट्टाचार्या साहब की हो या चटर्जी साहब की, पर ऐसी स्वस्थ्य और स्वाभाविक मौत किसी को कहां नसीब होती है? जैसी बनर्जी साहब को मिली.
भट्टाचार्या साहब एकलौते बूढे नहीं है. बुढ़ापा हर किसी के दरवाजे पर दस्तक देता है और जबरन घुस भी आता है. लाख कोशिश करो, चाहे कितना भी खुद को फिट रखो, प्रणायाम-ध्यान करो. सब धरा का धरा रह जाता है.
सिनेमा हॉल में खूब ठहाके लगे, मैं भी खूब हंसी. हंसने-मुस्कुराने के परहेजी पति 'सिन्हा जी भी' दांत निकाले बिना आवाज किये हंसते रहे. और मेरी चार साल की बेटी आध्या भी 'दादा जी' यानी 'बिग बी' की मजेदार हरकतों पर खूब हंसी.
'भट्टाचार्या जी' जैसे तीन बुजुर्ग मेरे घर में हैं. भगवान की कृपा से एक दिन भी मेरा घर बुजुर्गों से खाली नहीं रहा. कभी तीनों मेरी मां, मेरी सासू मां, और पापा (ससूर जी) रहते हैं. साल में दो-तीन महीने दूसरे बेटी-बहुओं के पास रहते हैं. मेरी हालत पीकू से कम नहीं है. गिरती पड़ती ऑफिस पहुंचती हूं.  नाश्ता खाना अक्सर ऑटो में या ऑफिस में ही करती हूं.
सोचती हूं घर में अगर दो बाथ-रूम न होता तो ? और मेरे ऑफिस में 'नहाने धोने' का ऑप्शन होता तो कितना अच्छा होता. बाथरूम सुबह से ही बुक हो जाता है. दो-दो घंटे के लिए, एक के बाद एक, यह सिलसिला एक बजे तक चलता है. बुजुर्ग हैं उन्हें दो नहीं हर बार चार बाल्टी पानी की जरूरत होती है.
अब मैं निर्गुन हो गयी हूं. पहले सगुन थी, भगवान की पूजा करती थी, अब मैं ध्यान और स्मरण से ही काम चला लेती हूं. पूजा-घर हमारा मंदिर जैसा है, एक के बाद एक की लाइन लगी रहती है. हम हाथ जोड़ ले भगवान से, यही काफी है. फिर भी मैं खुश हूं. कहते हैं जहां बुजुर्ग नहीं होते वह घर श्मशान जैसा हो जाता है.





अपने पत्रकारिता के करियर में 'वृद्धाश्रम' की कई स्टोरीज कीं, अक्सर मन भर आया. तब मैंने सोचा था चाहे जो भी हो, हमारे बुजुर्ग किसी 'वृद्धाश्रम' की कोठरी में नहीं, घर के आंगन में रहें.
उनकी देखभाल ऐसी हो कि उनकी मौत किसी अस्पताल में वेंटिलेटर से जबरन सांस लेते नहीं . बल्कि साफ-स्वच्छ हवा में ईश्वर उन्हें एक स्वस्थ मौत दे सके.

बुढ़ापा जिन्दगी का आखिरी पड़ाव है. लेकिन हम भूल जाते हैं कि हमारे बुजुर्गों ने अपना कर्तव्य निभाया. हर अच्छे-बुरे हालात से उन्होंने समझौता कर हमें योग्य बनाया. अब बारी हमारी है अपना कर्तव्य निभाने की.
हमें न उनकी पढ़ाई की फिक्र है और न शादी-ब्याह की. बस उनके लिए फिक्र इतनी होती  है  कि वे अपनों के बीच चैन की आखिरी सांस ले सकें. ताकि उन्हें भी सुकून मिल सके और हमें आजीवन उनका आशीर्वाद...

सोमवार, 25 अक्टूबर 2010

‘रखैल’ शब्द पर आपत्ति

‘रखैल’ शब्द से मेरे जेहन में तीन तस्वीरें उभरती हैं। चांद बीवी, बिंदिया नानी और भोलवा की मां। भोलवा की मां 1980 में ही गुजर गयीं। चांद बीवी अभी जिन्दा हैं। शायद बिंदिया नानी भी अब नहीं रही होंगी।
घर से बाहर ये औरतें कभी बेपर्दा नहीं दिखीं, हमेशा इनके चेहरे पर सिल्क का चादर चढ़ा रहा। पहचानने वाले कदकाठी से ही अनुमान लगाते होंगे कि ये फलां की रखैल हैं। ये लोग कभी किसी खास मौके पर मुहल्ले या रिश्तेदारों के घरों में नजर नहीं आयीं। तीज-त्यौहार, शादी-व्याह में इनका खाना इनके घर भिजवा दिया जाता था। कभी गयीं भी तो पंगत में नहीं बैठतीं, इनकी थाली अलग लगती थी। एकआध बार बैठीं भी तो और औरतें पंगत से उठ गयीं। इन्हें अलग मकान या घर के अलग हिस्सों में रखा जाता था। इनका परिवार आज भी ‘रखैल’ शब्द का दंश झेल रहा है।
रखैल किसी भी औरत के लिए शर्मनाक, वीभत्स, दंश देने वाला शब्द है। किसी भी औरत ने किसी भी काल में अपनी खुशी से किसी की रखैल बनना पसंद नहीं किया। औरत की मजबूरी, लाचारी, अज्ञानता और पुरुषों की सामंती प्रवृति ने महिलाओं को रखैल की संज्ञा दी। और अब जब हमारा लोकतंत्र महिला और पुरुष दोनों को समानता का अधिकार देता है तो ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ‘रखैल’ शब्द का प्रयोग सामंती मनोवृति ही कही जायेगी। भले ही यह अदालत की अवमानना हो पर ऐसे शब्दों के इस्तेमाल पर निंदा और आपत्ति होनी ही चाहिए।
महाधिवक्ता इंदिरा जयसिंह की नाराजगी जायज है। हैरानी तो इस बात की है अवमानना के डर से चंद लोगों के सिवा किसी ने आपत्ति जताने की कोशिश नहीं की। बात-बात पर प्रतिक्रिया देने वाले राजनेता खामोश रहे।
सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर हमें ऐतराज नहीं, हमें उसके ‘रखैल’ शब्द के इस्तेमाल पर आपत्ति है। सामंती व्यवस्था में कोई भी औरत बिना शादी के किसी पुरुष के साथ उस पर निर्भर होकर पत्नी की तरह रहती थी तो उसे ‘रखैल’ कहा जाता था। लेकिन लिव-इन-रिलेशन समाज की नजर में गलत है पर कानूनन वैध तो औरत ‘रखैल’ कैसे हो सकती है? लिव-इन-रिलेशन में औरत और मर्द समान हक से एक साथ रहते हैं। ऐसे में अगर औरत ‘रखैल’ है तो फिर पुरुष…!
सवाल यहीं खत्म नहीं होता। विवाह के अतिरिक्त स्त्री-पुरुष (पति-पत्नी की तरह) के संबंधों में औरत को ‘रखैल’ समझा जाता है। भले ही प्रेम-संबंध ही क्यों न हो। यह राय समाज के तथाकथित कुछ प्रबुद्ध लोगों की है। तो इस संदर्भ में आम आदमी की राय क्या होगी?
मैं हैरान हूं क्या औरत का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं? उसकी कोई इच्छा या अनिच्छा नहीं?
हम विकास की बातें करते हैं। दुनिया को दिखाने के लिए कॉमनवेल्थ गेम्स का भव्य आयोजन करते हैं। लेकिन वैचारिक भव्यता से हम कोसों दूर हैं।

अधिकतर भारतीय पुरुषों की नजर में औरत आज भी मात्र एक देह है। उसके व्यक्तित्व, उसके कृतृत्व, मान-समान, बुद्धि, स्वामीभान का कोई मूल्य नहीं? जिस की आधी आबादी का मूल्याकंन इस तरह किया जाए। अंदाज लगा सकते हैं कि उस देश को परिपक्व होने में एक सदी और लग सकता है।


बुधवार, 21 जुलाई 2010

द बर्निंग जर्नलिस्ट पास्ट अवे

‘द बर्निंग जर्नलिस्ट पास्ट अवे’ किसी अखबार में नहीं छपा और न ही कहीं हेडलाइन बनी। न उनका जनाजा निकाला और न ही किसी ने मातम मनाया। यहां तक की उनकी मौत पर शोकसभा भी आयोजित नहीं की गयी, पर मैंने उन्हें मरते हुए करीब से देखा।

बात 9वें दशक की है, तब मैं कॉलेज में थी, या पत्रकारिता की पढ़ाई कर रही थी। ठीक से मुझे याद नहीं। अखबार पढ़ती थी, खबरों को समझती थी और पत्रकारों को बड़ा सम्मान करती थी। मेरे पिता भी पत्रकारों के बड़े मुरीद थे। साहित्य की छात्रा होने की वजह से साहित्यक गोष्ठियों में जाया करती थी। उन्हीं दिनों एक समारोह में मैंने उन्हें देखा। उनका व्यक्तित्व आकर्षक था। कपड़े भी शानदार थे। पता चला शहर में हाथों-हाथ बिकने वाला सांध्य दैनिक के संपादक हैं।

अखबार के नाम के साथ-साथ उनका भी बड़ा नाम था। उन्होंने कई बड़े स्कैंडल का खुलासा किया था। लोग कहते थे, उनकी कलम में ताकत भी है और सच कहने की कुव्वत भी। मुझ नाचीज से उनका किसी ने परिचय नहीं कराया।

मैंने सोचा पत्रकारों को बड़ा सम्मान मिलता है। मैं पत्रकार बनूंगी और अगर न बन सकी तो पत्रकार से ही शादी करुंगी। मैं ये दोनों सपने वर्षों तक देखती रही। पत्रकार बनने का मतलब मेरे लिए हिमालय की चोटी पर चढ़ने जैसा ही था। किसी स्कूल में टीचर बन जाऊं तो लोग कबूल भी कर लेंगे। पत्रकार बनने का मतलब…खैर बाद में उनके अखबार में मेरे कई लेख छपे, पर मैं संपादक जी से कभी मिलने नहीं गयी। सुना संपादक जी का तबादला हो गया, वो दिल्ली चले गये।

जब मैं दिल्ली आई तो किसी परिचित ने मेरा उनसे परिचय करवाया। मेरे लिए दिल्ली एक दम अजनबी थी। हर जगह जाने के लिए मैं पहले आईएसबीटी या आईटीओ जाती और फिर वहां से बस लेकर दूसरी जगह। शायद किसी ने यह बताया था हर जगह की बस इन्हीं दोनों जगह से जाती है। संपादक जी के घर के बगल में पटना के कई लोग रहते थे। उनलोगों ने मेरे लिए भी वहीं कमरा ढूंढ दिया।

संपादक जी सूट-बूट टाई पहने लंबी गाड़ी से दफ्तर जाते। गाड़ी उन्हें छोड़ने आती। यहां भी उन्हें मैंने बड़ी शान-शौकत में देखा। पास में होने और उनके व्यवहार की वजह से उन्हें सर और उनकी पत्नी को भाभी जी कहती थी। उनकी दो बेटियां बुआ और बड़ी बेटी दीदी कहती थी। मेरी मां उनकी पत्नी के साथ छत पर बैठकर स्वेटर बुना करती थी और मैं उनसे लेख और खबरों पर सलाह मशवरा। तभी पता चला उनके चार बच्चे थे। तीन बेटियां और एक बेटा। उनकी दुश्मनी का खामिजा उनके बेटे को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी।

कुछ दिन बाद ही पता चला अखबार बंद हो गया। अखबार के दफ्तर के खिड़की-दरवाजे तोड़ दिये गये। शायद लोगों ने आग भी लगा दी थी। अखबार का मालिक जेल भेज दिया गया। संपादक जी बेरोजगार हो गये। उनका सारा तेल-फूलेल खत्म हो गया। घर में रखा धरा सब चुक गया। विदेशी शराब ठर्रे में बदल गयी। गाड़ी से आने जाने वाले संपादक जी सड़क पर गिरते-लड़खड़ाते नजर आने लगे। घर की हालत को देखकर उनकी बड़ी बेटी ने एक पार्लर में काम करना शुरू किया, लेकिन दो-चार दिन बाद ही पता चला पार्लर की आड में वहां कुछ और ही चल रहा था। लड़की डरी सहमी घर में कैद हो गयी। पूरा परिवार एक वक्त की रोटी के लिए मोहताज था। कुछ दिनों बाद उनका कुनबा कहीं और चला गया। शायद पटना या किसी दूसरे शहर, जहां उनका पूरा परिवार रहता था।

उसके बाद उनका नाम मैंने किसी अखबार में नहीं देखा और न ही उनका लिखा कुछ पढ़ा। पता चला अपने परिवार की परवरिश के लिए उन्हें अपनी कलम गिरवी रखनी पड़ी। यहां-वहां छोटे पत्र-पत्रिकाओं में नौकरी करते रहे और लाला के कहे लिखते-छापते रहे। अब उनका परिवार कहां है, मुझे पता नहीं?

मुझे लगा एक पत्रकार को जिन्दा रहने के लिए महज कलम की ही नहीं दौलत की भी जरूरत है। खुशवंत सिंह की तरह बहुत कम ही खुशनसीब पत्रकार-साहित्यकार होते हैं, जिन्हें लाला की दुकान पर नौकरी करने की जरूरत नहीं पड़ती है। जब किसी पत्रकार को नौकरी से निकाला जाता है और उसे जीविका के लिए अपनी कलम रखने पड़ती है, तब पत्रकार अपनी मौत का दंश खुद झेलता है। मैंने ऐसे कई पत्रकारों को मरते ही नहीं कत्ल होते देखा है। इन्हें अपने कद के हिसाब से लाइजनिंग या कोई और पेशा अपना पड़ता है। लिखूं तो एक लंबी फेहरिस्त बन जायेगी। जिनकी कलम में ताकत नहीं होती और न ही पॉकेट में इस्तीफा , वो तथाकथित पत्रकार ही हैं। ऐसे पत्रकारों को जिन्हें हर पल इस्तीफा ले लेने का खौफ सताता है, जिनकी कलम मजबूत नहीं होती, उन्हें अपना विचार व्यक्त करने का हक भी नहीं मिलता।

मुझे चिंता पत्रकार की मौत या कत्ल की नहीं बल्कि चौथे स्तंभ की है। आखिर लोकतंत्र का कमजोर होता यह खंभा कब तक जिन्दा रह पायेगा।

मंगलवार, 20 जुलाई 2010

शनिवार, 15 मई 2010

क्या कोई मेरे शहर का है?


क्या कोई मेरे शहर का है?
सुना है,
वहां गलियां सड़क में तबदील हो गयीं हैं,
दरवाजे पर लगा नीम सूख गया है,
नन्हां बरगद जवान हो गया है,
पहले घर का पुरवारी कोना ढ़ह गया,
फिर घर का कोना-कोना बंट गया,
और तब
मैं सोचता रहा,
थोड़ा और कमा लूं,
बच्चों को यहीं पढ़ा लूं,
अब बच्चे जवान हो गये हैं,
अब ये यहीं बस गये हैं,
पहले बुजुर्गों ने साथ छोड़ा,
अब दोस्तों का स्मरण कमजोर हो गया है,
मेरा जवान चेहरा ही उन्हें ख्याल आता है,
अब अकेला, कैसे जाऊं, अपने शहर,
बस ढूंढता हूं,
क्या कोई मेरे शहर का है?

मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

मां!



मां शक्ति,
मां पूजा,
मां इबादत,
मां जीवन की पहली पाठशाला,
मां प्रकृति की अनमोल निधि,
सपनों में मां,
ख्यालों में मां,
हर दुख-सुख में याद आती है मां,
मां कभी नहीं मरती,
अस्थियां विसर्जन के बाद भी,
मां का अवशेष नहीं मिटता,
मां कभी नहीं मर सकती,
मां जिन्दा रहती है,
मौत के बाद भी,
मां,
महानायक की मां,
नायक की मां,
खलनायक की मां,
सब की,
एक सी,
होती है,
मां...

सोमवार, 12 अप्रैल 2010

चिरकुटानंद स्वामी

चिरकुट-कामचोर,
पॉकेट में हाथ,
हर वक्त होते बॉस के साथ,
काम का बस करते शोर,
ये चिरकुट-कामचोर,
मुंह में हरदम गुटका और पान,
यही है चिरकुट की पहचान

गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

गिरगिट सा रंग




जब मैं छोटी थी,
जब कहीं गिरगिटों को देखती,
अपनी आंखें गड़ा देती,
जानना चाहती,
गिरगिट कैसे रंग बदलते हैं,
अब आंखें नहीं गड़ाती,
फिर भी देख लेती हूं,
गिरगिटों को रंग बदले।

घर और आतंकी का खेल

गुड़ियों को आद्रे की खीर खिलाकर कहा
अब सो जाओ,
जब दिवाली आयेगी तो,
तेरे लिए नये घरौदें बनाऊंगी
नये खिलौने लाऊंगी
फिर रोज खेलेंगे गुड़ियों का खेल
पिंकू दफ्तर जायेगा,
रिंकू स्कूल जायेगा,
तब जाड़े की धूप में बैठ कर
तुम सब के लिए स्वेटर बुनूंगी,
जब धूप छत के मुरेड़े से वापस जायेगी
चूल्हा जलाऊंगी,
तुम सब के लिए चाय बनाऊंगी,
खाना बनाऊंगी,
रात होगी हम सो जायेंगे,
तब भईया आतंकी का खेल खेलेगा,
मेरे गुड्डों का सर मरोड देगा,
गुड़ियों का बाल नोच लेगा,
मैं रोऊंगी, चिल्लाऊंगी,
मां समझायेगी,
मत रो,
जब तुम बड़ी हो होगी,
तो सच के गुड्डे-गुड़ियां होंगे
उनके सच के हाथ पैर होंगे,
सच की अंगुलियां होंगी,
वे हंसेंगे, खिलखिलायेंगे,
मगर सोना मत, भईया फिर आयेगा,
आतंकी का खेल खेलेगा,
और तुम्हारा घर उजाड़ देंगा।