गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

गिरगिट सा रंग




जब मैं छोटी थी,
जब कहीं गिरगिटों को देखती,
अपनी आंखें गड़ा देती,
जानना चाहती,
गिरगिट कैसे रंग बदलते हैं,
अब आंखें नहीं गड़ाती,
फिर भी देख लेती हूं,
गिरगिटों को रंग बदले।

घर और आतंकी का खेल

गुड़ियों को आद्रे की खीर खिलाकर कहा
अब सो जाओ,
जब दिवाली आयेगी तो,
तेरे लिए नये घरौदें बनाऊंगी
नये खिलौने लाऊंगी
फिर रोज खेलेंगे गुड़ियों का खेल
पिंकू दफ्तर जायेगा,
रिंकू स्कूल जायेगा,
तब जाड़े की धूप में बैठ कर
तुम सब के लिए स्वेटर बुनूंगी,
जब धूप छत के मुरेड़े से वापस जायेगी
चूल्हा जलाऊंगी,
तुम सब के लिए चाय बनाऊंगी,
खाना बनाऊंगी,
रात होगी हम सो जायेंगे,
तब भईया आतंकी का खेल खेलेगा,
मेरे गुड्डों का सर मरोड देगा,
गुड़ियों का बाल नोच लेगा,
मैं रोऊंगी, चिल्लाऊंगी,
मां समझायेगी,
मत रो,
जब तुम बड़ी हो होगी,
तो सच के गुड्डे-गुड़ियां होंगे
उनके सच के हाथ पैर होंगे,
सच की अंगुलियां होंगी,
वे हंसेंगे, खिलखिलायेंगे,
मगर सोना मत, भईया फिर आयेगा,
आतंकी का खेल खेलेगा,
और तुम्हारा घर उजाड़ देंगा।