शुक्रवार, 8 मई 2009

इतिहास बन कर रह गयी पटना कलम शैली

पटना कभी गुलाब, कभी शबाब और कभी अपने निराले अंदाज के लिए मशहूर रहा, तो कभी कला की खूबसूरती और बारीकी के लिए जाना जाता रहा. पटना की एक खास कला “पटना कलम” के नाम से विख्यात विश्व के चित्र कला शैलियों में एक अलग पहचान रखती है, लेकिन आज समय के प्रवाह ने इसे उस जगह ला दिया है, जहां इसकी पहचान बरकरार रखना भी मुश्किल हो गया है.
यों तो प्रत्येक कला शैली पर देश, काल, सामाजिक वातावरण, प्रकृति, व्यक्तिगत विचार और मनोवृति का प्रभाव तो पड़ता ही है, उस पर समाकालीन कला शैली का भी असर होता है. “पटना कलम” शैली भी इस प्रभाव से अछूती न रह सकी. नतीजतन ये शैली धीरे-धीरे अपनी पहचान खोती चली गयी. आज स्थिति यह है कि इस शैली के चित्रकार नगण्य है. “पटना कलम” शैली को जिन्दा रखने के लिए न तो पुराने कलाकारों ने कोशिश की और न ही नये चित्रकारों ने इसे जानने और सिखने में दिलचस्पी दिखाई. प्रोत्साहन और प्रशिक्षण के अभाव ने“पटना कलम” शैली को विशिष्ट नहीं होने दिया. अब तो इस शैली के आखिरी चित्रकार राधामोहन बाबू को गुजरे भी जमाना हो गया.
हालांकि “पटना कलम” शैली कई कला शैलियों के सम्मिश्रण से विकसित हुई. बावजूद इसकी मौलिक पहचान थी. ये यहां के कलाकारों में ही विकसित हुई लेकिन
तत्कालीन मुगल शैली भिन्न थी. इस शैली की खासियत ये थी कि इस के चित्रकार स्केच का सहारा नहीं लेते थे. वे सीधे ब्रश से ही आकृतियां बनाया करते थे. इस रंग, ब्रश और कागज बनाने का तरीका भी अनोखा था.इस शैली के कलाकार रंग फूल, फल, पत्थर, काजल, धातू और मिट्टी से तैयार किया करते थे. सिन्दूर, सिंगरहट और गेरू से लाल रंग, हरश्रृगार और रामरस से पीला रंग, लाजू पत्थर और नील से नीला रंग, चराग के फुलियों से काला, सोने से सुनहरा और शगरी मिट्टी से सफेद बनाया करते थे. ब्रश भी कई तरह के बनाये थे. बारीक चित्रकारी के लिए गिलहरी की पूछ के बाल से ब्रश बनाया जाता था और मोटे कामों के लिए ऊंट, हिरण तथा बकरे के बालों को उबाल कर कबूतर या चील के पंख से बांध कर ब्रश बनाया जाता था. कैनवास बनाने के लिए सूत, फटे-पुराने कपड़े और बांस इस्तेमाल करते थे और कैनवास पर रंग लगाने के लिए गोंद का उपयोग करते. ये इनकी शैली की खास विशेषता थी.

इनके काम का अंदाज भी बिल्कुल अलग था. ये बरसात के दिनों में रंगों का निर्माण करते, गर्मी के दिनों में आकृतियां बनाते और जाड़े के दिनों में आकृतियों में रंग भरा करते थे. बाद में दूसरी शैलियों के प्रभाव में ये शैली अपनी मूल तकनीक से अलग होती चली गई. इसका माध्यम जल रंग था. पाश्चात्य शैलियों के संपर्क में आने के बाद इसमें तैल रंगो का प्रयोग किया जाने लगा. स्टींपलिंग की जगह पर ब्रश स्ट्रोक्स का प्रयोग होने लगा. इसके चित्रकारों परम्परागत चित्रांकन को नए रूप में ढ़ाला. बड़े-बड़े चित्रों की जगह छोटे-छोटे चित्र बनाने की शुरुआत इन्हीं चित्रकारों ने की.
पटना कलम के चित्रकारों के बारे में कहा जाता है कि ये शैली राजस्थान, दिल्ली, मुरादाबाद के राज घरानों से होती हुई पटना के आम घरों पर दाखिल हुई और इनकी रोजमर्रा की जिन्दगी में अंकित होने लगी. इन लोगों ने राजा-महाराजाओं के चित्रों की जगह चाक पर काम करते कुम्हार, लोहार, मोची, भंगी और पशु-पक्षियों को चित्रित किया. कला जगत में प्रगतिवाद की शुरुआत यही से हुई.
जैसा कि कहा जाता है पटना कलम के चित्रकारों के पूर्वज प्रतापगढ़ के रहने वाले थे और अकबर के दरवार में चित्रकारी किया करते थे. यह भी कहा जाता है कि पटना शैली के पूर्वज मनोहर अकबर के समय के ही चित्रकार थे. इनके वंशज औरंगजेब के काल में अत्याचार तंग होकर पटना भाग आए और मुर्शिदाबाद चले गए. सन् 1857 में वे लोग भी मुर्शिदाबाद से पटना चले आए और पटना सिटी के लोदी कटरा, चौक, दिवान मुहल्ला इलाकों में बस गए. यहां के कलाविद रईसों, जमींदारों-नवाबों ने इन्हें प्रश्रय दिया. बाद में ये लोग यहीं के होकर रह गए.
पटना कलम शैली का विकास करीब 1760 में हुआ जो बीसवीं सदी के पूर्वार्ध तक रहा. इस शैली के प्रथम चित्रकार श्री सेवक राम माने जाते हैं. इनका कार्यकाल 1770 से 1830 माना जाता है. इनके समकालीन दुलास लाल का कार्यकाल 1875 तक माना जाता है. जयराम दास का नाम इन्हीं दिनों के कलाकरों में लिया जाता है. सन् 1830 और 1850 के बीच झुमकलाल, फकीरचंद लाला का नाम आता है, सन् 1850 से 1880 के दौरान पटना शैली के दो कलाकार शिवलाल और शिव दयाल लाल लोकप्रिय हुए. गोपाल लाल, मुकुंद लाल, गुरु सहाय लाल, बेनी लाल और गोविन्द लाल प्रमुख थे. इनके अलावा इस शैली में दो महिला चित्रकार सोना देवी और दक्षो देवी ने भी योगदान दिया. बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध आते-आते पटना शैली की गति धीमी होती गई. नवाबों का जमाना चला गया, अंग्रेजों की उपेक्षा के शिकार कलाकार धीरे-धीरे शहर छोड़कर चले गए या दूसरे पेशे को अपना लिया. पटना कलम का घराना महादेव लाल का लोदी कटरा में रह गया. उन्हीं से यहां चित्रकारों ने प्रशिक्षण लिया.

जैसा कहा जाता है पटना शैली के आखिरी कलाकार ईश्वरी प्रसाद वर्मा हुए. वे चित्रकार शिवलाल जी के नाती थे. ईश्वरी प्रसाद के पुत्र रामेश्वर प्रसाद ने भी चित्रकारी कि शिक्षा ली थी. इनके अलाव पटना कलम के तीन चित्रकारों का लिया जाता है, राधा मोहन बाबू, उपेन्द्र महारथी और दामोदर प्रसाद अम्बष्ठ. राधा मोहन बाबू ने इसे जीवित रखने का प्रयास किया. दामोदर बाबू की कला शैली पर कई शैलियों का प्रभाव रहा. मौजूदा कलाकार पटना शैली के कलाकार होने का दावा जरूर करते हैं पर इनकी कला को पटना शैली का कहना पटना कलम के साथ अन्यान होगा. हालांकि इस शैली को जीवित रखने के लिए कई कलाकारों ने अपनी तूलिका चलायी वहीं कई लेखकों ने भी इसकी संरचना रूपरंग को जिन्दा रखने के लिए अपनी लेखनी चलायी.

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